जयप्रकाश नारायण से बात करते हुए पूर्व बीबीसी संवाददाता मार्क टली

दिलचस्प यह है कि 1938 तक बिहार कांग्रेस वर्किंग कमिटी में एक भी ब्राह्मण सदस्य नहीं था. श्री कृष्ण सिंह के निधन के बाद बिहार के राजनीतिक गुटों में व्यापक बदलाव आया. सवर्णों के बीच ही सत्ता के लिए गुटबंदी तेज़ होने लगी. 1967 में जब महेश प्रसाद सिन्हा की हार हुई तो इसकी बड़ी वजह थी कि ब्राह्मण, राजपूतों और कायस्थों का एक होना.
श्री कृष्ण सिंह के निधन और अनुग्रह नारायण सिन्हा के निधन के बाद भूमिहारों और राजपूतों में उस क़द का कोई नेता नहीं था. राजपूतों का एक तबक़ा अनुग्रह नारायण सिन्हा के बेटे सत्येंद्र नारायण सिन्हा के नेतृत्व में आया तो एक तबक़ा बिनोदानंद झा के साथ रहा.
श्रीकृष्ण सिंह और अनुग्रह नारायण सिन्हा के ज़िंदा रहते बिहार में कांग्रेस दो ध्रुवों में थी लेकिन इन दोनों नेताओं के निधन के बाद कांग्रेस में कई गुट हो गए. कांग्रेस का पूरा ढांचा बदल गया.
आधुनिक बिहार के निर्माण में इन दोनों नेताओं की बड़ी भूमिका को रेखांकित किया जाता है. बिहार की राजनीति में श्रीकृष्ण सिंह और अनुग्रह बाबू की जोड़ी की मिसाल दी जाती है.
अनुग्रह नारायण सिन्हा श्रीकृष्ण सिंह की सरकार में उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री थे. दोनों नेताओं के बीच भरोसे और दोस्ती की कई कहानियां हैं. दूसरी तरफ़ कई लोग इन दोनों नेताओं के बीच जातीय टकराव यानी भूमिहार बनाम राजपूत की भी बातें कहते हैं.
क्या वाक़ई दोनों नेताओं के बीच किसी क़िस्म का कोई जातीय टकराव था?
उस दौर को क़रीब से देखने वाले बुज़ुर्ग सीपीएम नेता गणेश शंकर विद्यार्थी इसे सिरे से ख़ारिज करते हैं. वो कहते हैं कि दोनों नेताओं के बीच इतना प्रेम था कि लोगों ने इन्हें एक-दूसरे से गले लगकर रोते देखा है.
विद्यार्थी कहते हैं, ''बिहार में 1938 में अंग्रेज़ों के टाइम में पहला कांग्रेस मंत्रिमंडल बना. इसमें दोनों नेताओं के बीच पूरी सहमति थी. 1946 में श्री बाबू के नेतृत्व में सरकार बनी उस वक़्त भी कोई दिक़्क़त नहीं थी. 1952 में चुनाव हुआ तो उस वक़्त भी कांग्रेस श्री बाबू और अनुग्रह बाबू के नेतृत्व में एक होकर लड़ी.''
श्रीबाबू और अनुग्रह बाबू के रिश्तों में सबसे अहम मोड़ आया 1957 के बिहार विधानसभा चुनाव के बाद. विद्यार्थी कहते हैं, ''1957 में संकट आया. केबी सहाय के लोगों ने दोनों के बीच विभेद डालना शुरू कर दिया था. इस विभेद की बागडोर अनुग्रह बाबू के बेटे सत्येंद्र नारायण सिन्हा ने संभाली. अनुग्रह बाबू श्रीबाबू के ख़िलाफ़ बिल्कुल खड़ा नहीं होना चाहते थे. इसमें मुख्य भूमिका उनके बेटे की ही रही."
विद्यार्थी बताते हैं, "राजपूतों का एक गुट अनुग्रह बाबू को चढ़ा रहा था. ज़ाहिर है नतीजा श्रीबाबू के पक्ष में गया. श्रीबाबू की जीत हुई तो अनुग्रह बाबू उनके घर पहुंचे और दोनों गले मिलकर रोए. अनुग्रह बाबू ने कहा कि कुछ नासमझ लोगों के चक्कर में वो फँस गए थे. ऐसा नहीं है कि विधायक दल के नेता के चुनाव में राजपूत विधायकों ने अनुग्रह बाबू का ही साथ दिया. बड़ी संख्या में राजपूत विधायक श्रीबाबू के साथ थे.''
1957 में ही जयप्रकाश नारायण ने श्रीकृष्ण सिन्हा को लिखे पत्र में कहा था, ''आपकी सरकार को लोग 'भूमिहार राज' कहते हैं.''
गणेश शंकर विद्यार्थी कहते हैं कि जेपी के इस आरोप में कोई दम नहीं था. सच ये है कि उन्होंने केबी सहाय के लिए ऐसा आरोप लगाया था. वो कहते हैं, ''उस वक़्त कायस्थों की एक मीटिंग हुई थी और उसी मीटिंग के बाद उन्होंने श्रीबाबू पर बेबुनियाद आरोप लगाए थे. उनका आरोप ही जातिवादी था."

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