राम मंदिर निर्माण मुद्दा 'ठंडे बस्ते' में क्यों?

पिछले कुछ महीने से पैतृक संगठन राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ की आवाज़ में आवाज़ मिलाकर राम मंदिर निर्माण के लिए क़ानून की मांग कर रहे और इसके समर्थन में धर्म-सभाएं कर रहे विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर आंदोलन को लोकसभा चुनाव तक स्थगित करने की घोषणा की है.
हालांकि विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय संयुक्त महासचिव सुरेंद्र जैन बार-बार इस बात पर ज़ोर देते रहे कि 'आंदोलन स्थगित नहीं हुआ' बल्कि इसे सिर्फ़ अगले चार महीने न करने का निर्णय लिया गया है ताकि इसका राजनीतिकरण न हो सके.
साथ ही परिषद का मानना है कि 'सेक्युलर बिरादिरी को इस पवित्र आंदोलन को राजनीतिक दलदल में घसीटने का अवसर' न मिले इसलिए वह इसे स्थगित कर रहा है. इस बात का ज़िक्र कुंभ धर्मसंसद में राम जन्मभूमि पर एक फ़रवरी को पास हुए प्रस्ताव में भी है.
लेकिन कुंभ में और भी काफ़ी कुछ हुआ- 13 बड़े अखाड़ों से मिलकर बने अखाड़ा परिषद ने वीएचपी की धर्मसंसद का बहिष्कार करने का फ़ैसला किया और ख़बरों के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मान-मनौवल के बावजूद बहिष्कार ख़त्म न करने को तैयार हुए.
अखाड़ा परिषद के प्रमुख आचार्य नरेंद्र गिरि ने न सिर्फ़ राम मंदिर मामले में वीएचपी की भूमिका पर सवाल उठाया बल्कि केंद्र सरकार के उस क़दम का भी विरोध किया जिसमें ग़ैर-विवादित भूमि को न्यास को सौंपने की बात कही गई है. न्यास वीएचपी के अधीन है.
अंग्रेज़ी अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़ नरेंद्र गिरि ने कहा, "केंद्र चार सालों तक चुप बैठा रहा और अब उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अर्ज़ी डाली और आरोप लगाया कि राम मंदिर का इस्तेमाल राजनीतिक फ़ायदे के लिए किया जा रहा है."
अयोध्या द डार्क नाइट नामक किताब के सह-लेखक और वरिष्ठ पत्रकार धीरेंद्र झा कहते हैं, "राम मंदिर निर्माण में बाधा को ख़त्म करने के नाम पर आरएसएस और वीएचपी ने जब क़ानून की मांग शुरू की थी तब उन्हें ये अंदाज़ा नहीं था कि पासा उल्टा पड़ जाएगा."
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत पिछले दिनों अदालत में हो रही देरी की वजह से हिंदुओं के धैर्य समाप्त होने और जल्द से जल्द राम मंदिर निर्माण के लिए अध्यादेश या क़ानून लाने की मांग करते रहे हैं.
वीएचपी ने राम मंदिर को लेकर पिछले साल से चरणबद्ध तरीक़े से कार्यक्रम किया है.
लेकिन कई वर्गों से ये भी सवाल उठते रहे हैं कि बीजेपी पूर्ण बहुमत से सरकार में आने पर मंदिर निर्माण का वादा करती रही है लेकिन चार सालों में इसे लेकर कोई बड़ा क़दम अब तक क्यों नहीं उठाया गया.
धीरेंद्र झा कहते हैं, "आरएसएस और वीएचपी अब ये सोच रही है कि राम मंदिर मामले को भूनाना तो मुश्किल दिख रहा है तो कम से कम बीजेपी को नुक़सान से बचा लिया जाए और इसी रणनीति के तहत आगे बढ़ा क़दम पीछे खींचा गया है."
हिंदुत्व संगठनों को क़रीब से जानने वाले राजनीतिक विश्लेषक जगदीश उपासने का मानना है कि इसमें कोई रणनीति नहीं है और संघ चाहता है कि सारा मामला अदालत के माध्यम से तय हो.
वह इस संबंध में आरएसएस के सर-कार्यवाह सुरेश भैयाजी जोशी के उस बयान का हवाला देते हैं जिसमें कहा गया था कि राम मंदिर का निर्माण 2025 तक होगा.
जगदीश उपासने ये भी कहते हैं कि 'संतों के बीच से अलग-अलग सूर उठना कोई नई बात नहीं बल्कि ऐसा पहले भी होता रहा है, 1990 के दशक से ही जब मंदिर आंदोलन ज़ोर पकड़ रहा था.'
वीएचपी का भी कहना है कि हो सकता है कुछ संत कुंभ कार्यक्रम में अनुपस्थित रहे हों लेकिन साधू-संतों और अखाड़ों के एक बड़े वर्ग ने धर्म-संसद में भाग लिया और प्रस्तावों का समर्थन किया.
सुरेंद्र जैन ज़ोर देकर कहते हैं कि बीजेपी को इस मुद्दे पर होने वाले फ़ायदे-नुक़सान से वीएचपी का कोई लेना-देना नहीं है लेकिन ये पूरा मामला बैकफ़ुट पर कैसे गया ये मोहन भागवत के भाषण से साफ़ हो जाता है.
धर्म-संसद में बोलते हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था, "… उनको हमारे आंदोलन की कठिनाई नहीं होनी चाहिए, उनको मदद होनी चाहिए ऐसा ही हमको करना पड़ेगा."
अब ये 'उनको' कौन है ये सबको पता है.

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